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Wednesday, September 7, 2011

कैसी हो!

अपनी गलियां अकसर तेरी पता पूछती है,
मेरी ख़ामोशी तेरी बेवफाई को कितना छुपाये,
मेरी धरकन तो सब बयां करती है.
और अनजान सा हो जाता हूँ ,
उन चीजो से जिसने ठहाके लगाये थे,
तेरे मेरे संग.
पत्थरों का ठक-ठक,
डालियों का वो झुरमुठ,
बादलों का ठंढक,
आज भी तेरे संग का एहसास दिलाता है.
न जाने कैसे पता इनको कि में तेरे बिना,
जी नहीं सकता,
अकसर मेरा हाल पूछने चले आते है.
इसे क्या नाम दू,
पता नहीं,
लेकिन चाहता हूँ,
तेरे होने की चाहत मुझे बर्बाद करे।

दीपक...

Tuesday, August 30, 2011

गर फिर से.. तो क्या !

गर तू फिर मिल भी जाये तो क्या,
वो नज़रे वही होगी,
जिससे हमने कई सपने देखे थे,
जिससे छलकते थे मय और,
गर छलके फिर से,
तो क्या वही शमा होगी,
जो तेरी सादगी से रोशन थी I
क्या वो हथेली वही होगी,
जिसके लकीरों में हमने बनाये थे एक पगडण्डी,
जो हमें लेकर जाती थी हमारे अपने शहर,
आज भी में उस गलियारे से गुजरता हूँ,
जब तुम मेरे साथ होते हो I
न जाने क्यों गिरने लगता हूँ उस पगडण्डी पे,
जब तुम साथ नहीं होते,
गर तू फिर मिल भी जाये तो क्या,
तेरा सर फिर मेरे कांधे पे होगा,
नहीं न !

" दीपक"

Monday, August 29, 2011

लोकपाल और जन-लोकपाल! आशाएं और निराशाएं....

देश की सड़कों ने एक बार फिर उस जज्बात को महसूस किया जो शायद कई साल पहले आज़ादी की लड़ाई में महसूस किया था. लेकिन इस बार बहुत कुछ बदला बदला सा था. आन्दोलन का स्वरुप कमोबेश गाँधी जी के द्वारा सुझाये गए रास्तों के अनुसार था, लेकिन भावनाएं मिली जुली थी. रामलीला मैदान में गाँधी और भगत सिंह को साथ साथ देखा गया. लोगों के हाथ में भगत सिंह, आज़ाद और राजगुरु का पोस्टर था और ओठों पे " रघुपति राघव राजा राम". मैं यहाँ यह नहीं बताने आया हूँ की जन-लोकपाल का भविष्य क्या है, लेकिन इतना जरुर कहूँगा कि जहाँ कि जनता अपने अधिकारों के लिए जागरूक हो.. वहां कोई उसे पथभ्रमित नहीं कर सकता. क्या ये काम है कि जिस सिध्यांतों की धज्जियाँ हर चाय की चुसकी के साथ उडती है और समय काटने के लिए नौजवान गाँधीवादी विचारधारा को अपना निशाना बनाते है, आज उसी सोच के बदोलत पुरे भारत में एक जन-शैलाब का उठा जिसमे न कोई मुसलमान था, न कोई हिन्दू और न ही कोई दलित.

यह वाकई बहुत गंभीर प्रश्न है कि क्या लोकपाल भ्रष्ट नहीं हो सकता? शायद आप की बातों में सच्चाई हो, लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है कि लोकपाल भ्रष्ट न हो.. और भ्रष्ट हो भी तो उसके ऊपर नकेल कसी जा सकती है, ऐसा प्रावधान है जन-लोकपाल में.. अगर हम इस बात से डरते है कि भ्रष्ट लोकपाल पे नकेल नहीं कसी जा सकती तो हमलोग अपने लोकतान्त्रिक व्यवस्था पे शक कर रहे है..जैसा कि कुछ राज्यों में लोकपाल के होते हुए भी वहां भ्रषाचार अपने चरम सीमा पे है और कहीं कहीं तो लोकपाल ही नहीं है. करीब 18 राज्यों में लोकायुक्त है और वहां कई सम्भेधानिक मजबूरियां है जो इसे अपने काम करने में बाधा डाल रही है. लेकिन वहीँ यद्दुराप्पा जैसे मजबूत मुख्यमंत्री को अपना पद छोरने में समय नहीं लगा.. तो हम कैसे कीसी नतीजे पे आ सकते है, जबतक इसे जमीनी स्तर पे लागु न किया जाये. बिहार में मृतप्राय लोकपाल को पुन पटरी पे लाने के लिए नितीश कुमार ने फैसला किया है कि लोकायुक्त के अधिकार क्षेत्र को बढ़ाया जायेगा और मुख्यमंत्री को भी इस दाएरे में लाया जायेगा.. ताकि लोगों का विश्वास लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कायम रहे.. हमारे पास और भी कई कानून है जो भारत को एक मजबूत लोकतंत्र बनाने में काफी अहम् भूमिका निभाती है.

कोई भी कानून अकेले भ्रष्टाचार को ख़त्म नहीं कर सकती, इसके लिए हर एक को जानना होगा कि आखिर इस कानून से लोगों का क्या फायदा होगा और कैसे इसे प्रयोग में लाया जाये..

Friday, March 11, 2011

तुम बहुत जिद्दी हो गए हो.
लेकिन जिद्द कभी कभी खुदाई का एहसास दिलाता है.
शायद इसलिए तुमसे शिकायत नहीं.
फिर भी बहुत जिद्दी हो गए हो.

जब कभी मैं चाँद को देखता हूँ.

तुम मचलने लगते हो.
मैं नहीं जनता क्यों.
लेकिन तुम्ही हो जो मुझे चाँद से वफाई सिखाता है.
बहुत जिद्दी हो गए हो.

Tuesday, September 28, 2010

मत बाटों इन्सान को..

मंदिर- मस्जिद- गिरिजाघर ने,
बाँट लिया भगवन को,
धरती बांटी सागर बाटा
मत बांटों इन्सान को।

अभी रह तो शुरू हुई है,
मंजिल बैठी दूर है,
उजीयाला के महलों में बंदी,
हर दीपक मजबूर है।

मिला न सूरज का संदेशा
हर घटी मैदान को,
धरती बांटी सागर बाटा -
मत बाटों इन्सान को।
अब भी हरी भरी धरती है,
ऊपर नील वितान है।
अभी प्यार का जल देना है,
हर प्यासी चट्टान को।
धरती बांटी सागर बाटा,
मत बाटों इन्सान को।

Saturday, August 21, 2010

जो बीत गयी सो बात गयी....

किसके रोने से कौन रुका है यहाँ,
जाने को ही सब आयें है , सब जायेंगे,
चलने की तैयारी ही तो है जीवन,
कुछ सुबह गएँ, कुछ डेरा शाम उठाएंगे।

संध्या को जब सूरज डूबता है पच्शिम मे,
तब कितने फूल बाग में मुरझा जाते है,
जब सुबह खिसक कर, चाँद कहीं सो जाता है....
तब कितने आंसू धरती पर उग आते है।